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IAAN EXPRESS

 News that Become Your Voice              ख़बरें जो बनती हैं आपकी आवाज़             

 

IAAN Express, is a Pan-India RNI Registered Newspaper, with the Ministry of Information and Broadcasting. Its Registrar of Newspapers for India number is DEL BIL /2004/13858. 


It is published fortnightly [every 15 Days] in bilingual format [both hindi and english content] and features News Reports, Articles, Editorials, Features, IAAN News etc. The paper intends to provide the entire College Community a rare and fulfilling opportunity to professionally write and get published in a Registered Newspaper.

The Newspaper is run professionally and in a holistic manner and only selected students articles are able to make the cut for the paper. Students that show promise and a dedication to work are further given an opportunity to represent the Newspaper at National and International Events, Press Conferences, Diplomatic Gatherings, Official Dinners and Government of India Functions etc.

Occassionally, Students of great calibre are selected and nominated as Student Editors of the Paper, and they then write for the paper as well as edit it. Student Editors are issued National Press Identifications that are valid throughout the territory of India, so that they may attend all Press Events on behalf of the Newspaper, and represent in a worthy manner that upholds the proud tradition of IAAN Express. 

The latest edition of IAAN Express can be found here :       15 Aug - 31 Aug 2017.pdf    1 Sep - 15 Sep 2017.pdf   1 Oct - 15 Oct 2017.pdf

 

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STUDENT ARTICLE :

No Means No... चाहे वो बीबी ही क्यों न हो

'No. No, Your Honour... ना सिर्फ एक शब्द नहीं, अपने आप में एक पूरा वाक्य है। इसे किसी तर्क, स्पष्टीकरण, एक्सप्लेनेशन या व्याख्या की जरूरत नहीं होती। ना का मतलब ना ही होता है। उसे बोलने वाली लड़की कोई परिचित हो, फ्रेंड हो, गर्लफ्रेंड हो, कोई सेक्स वर्कर हो, या आपकी अपनी बीबी ही क्यों न हो, नो मिन्स नो... And When Someone Says So; Stop...'

ये शब्द याद हैं आपको। आपने पिंक फ़िल्म देखी हो तो शायद याद होगा। एक बूढ़े वकील द्वारा तीन लड़कियों के सम्मान-स्वाभिमान-स्वतंत्रता की सार्थकता को जीवंत बनाने वाली इस जिरह को पहली बार देखकर आंखों में आंसू आ गए थे। पूरी फिल्म में केवल कोर्ट रूम की वो जिरह मैंने सैकड़ों बार देखी है। आज सुबह-सुबह ये फिर से याद आ गया। अखबार खोला, तो पहले पन्ने पर ही खबर थी, 'केंद्र ने कहा, वैवाहिक दुष्कर्म को अपराध बनाना ठीक नहीं।' पहली बार में लगा, कुछ गलत पढ़ लिया, केंद्र सरकार और वो भी महिलाहित के मुद्दों पर मुखर रहने वाली सरकार ऐसा कैसे कह सकती है। लेकिन पूरी खबर पढ़ी, तो यकीन हो गया कि ये बराबरी की बात करने वाली लोकतंत्रताकम शासन पद्धति की आवाज़ नहीं, बल्कि उस पुरुषवादी मानसिकता की सामंती सोच है, जो महिला में 'मैं' वाले अहसास को देखने की आदी नहीं और जो चाहती है कि महिला की पहचान मर्द के नाम की मोहताज बनी रहे। उसकी बीबी उसके लिए बस खिदमत की खादिम हो और पति के हुक्म की तमिल करना ही पत्नियों का फर्ज बना रहे। क्या सितम है कि आज़ादी के 7 दशक बाद जब हम स्वतंत्रता की नई परिभाषा गढ़ रहे हैं, तब सरकार का वकील न्यायालय में खड़े होकर कहता है कि 'वैवाहिक दुष्कर्म के मामले में महिलाओं को अधिकार दे देने से इसका बेजा इस्तेमाल होगा।' काश... काश कोर्ट रुम में पिंक फ़िल्म के बुजुर्ग दीपक सहगल जैसा कोई वकील होता, जो उस सरकारी भोंपू की आंख में आंख डालकर कह सकता कि आज के दौर में जब अधिकार और हक विमर्श का विषय बन रहा है उस समय खुद पर होने वाले जुल्म के खिलाफ आधी आबादी के विरोध को कोई बेजा नहीं बता सकता, चाहे वो सरकार ही क्यों न हो। काश पिंक फ़िल्म का न्याय आज की वास्तविकता बन पाता . . . . . .  

(read full article in the paper) 

 निरंजन कुमार मिश्रा

 

 

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